Sunday, November 16, 2008
वो सड़क पर सोया किए था बड़ी शान से,
घर की तलाश में निकल कर मकान से,
मरासिम तोड़ आया था सारे जहानसे,
जिंदगी को ढूँढने निकला तो था मगर,
बेकस हाथ धो गया अपनी ही जान से,
सूरज कि रोशनी से जला था एक बार,
घबराता रहा तमाम उम्र आसमान से,
कहते थे लोग के अजब काफिर था बेफरक
आरती सुनता था मस्जिद की अजान से,
ग़ज़ल कहता था कुछ कमबख्त इस तरह
कि जान ले लेता था अंदाज़-ऐ-बयान से
जिंदगी को ढूँढने गया निकला तो था मगर,
बेकस हाथ धो गया अपनी ही जान से.......................
Thursday, November 13, 2008
मुझे तुमसे,
जरूरी बात करनी है.
सच है कि,
तुम्हारा भी,
मैंने दिल दुखाया है,
मैं अपनी,
खताओं की,
अगर माफी मांग लूँ तो,
मुझे तुम माफ़ मत करना,
सजा देना जो तुम चाहो,
पर मुझको माफ़ करना,
सुना है तुम,
रहमदिल हो,
खताएं बख्श देते हो,
पर अब भी,
अगर मेरी,
खताएं भूल बैठे तुम,
तो मैं सुधरूंगा कैसे,
सच कहता हूँ,
तुम मेरी,
बातों पर यकीन करलो,
मैं जाहिल हूँ,
संगदिल हूँ,
अगर इस पत्थर को तुम भी,
इक मूरत बना लोगे,
तो मुझको,
ग़लत सच का,
फर्क मालूम कब होगा,
हाँ सच है,
कि मेरे भी,
सीने में दिल धड़कता है,
अगर बदनाम होने से,
बचा लोगे इस दिल को,
तो मुझे सज़ा कैसे होगी,
तुम जहीन हो,
समझते हो,
अपना भी,
पराया भी,
मेरे दिल की खताओं को,
तुम इक जुर्म समझ लेना,
सजा देना जो तुम चाहो,
अकेला हूँ,
इसलिए तुम,
इस तरहा रूठ मत जाना,
मेरे दिल की
खताओं को,
एक दम भूल मत जाना,
अगर तुम माफ़ कर दोगे,
मेरे दिल की खताओं को,
तुम्ही बोलो,
फिर कैसे,
मैं ख़ुद को माफ़ कर दूँ गा,
ये मुमकिन है,
मैं यूंही,
तुम्हारी जान खाता हूँ,
पराये हो,
मगर फिर भी,
मैं अपना हक़ जताता हूँ,
मुझे तुम माफ़ मत करना,
नहीं तो मैं,
गिर जाऊँगा,
ख़ुद अपनी ही नज़रों से,
गुजारिश है,
सज़ा देना,
मगर तुम सज़ा क्या दोगे,
मैं कहता हूँ,
सज़ा मेरी,
मुझे तूम भूल ही जाना,
इससे अच्छी,
सज़ा कोई,
मुझे मिल ही नही सकती,
शुक्रिया है,
की तुमने,
मेरी ये बात सुनली है,
अब तुम ये मान भी लो,
सच बोलूँ,
मुझे तुमसे,
यही इक बात करनी थी................
Wednesday, November 12, 2008
चाहे शम्मा जान लेले उसके दीवानों की यूँ।
चाहे मन्दिर लुट जाए या कि मस्जिद जल जाए,
आबरू मिटती नही है मेरे मैखानों की यूँ।
साकिया तू छोड़ दे बाजू भले ही हाँ मगर,
आदत नही है छोड़ने की देख पैमानों की यूँ।
ज़माने भर में नाम मशहूर कर देती है शराब,
और भी बढ़ा देती है इज्जत इंसानों की यूँ।
भीड़ में तन्हाई देकर भेजता है मैकदे,
जान ले लेता है बेकस प्यार इंसानों की यूँ.
वो फूल रेत में दबा दिए,
मुझे ज़माना भूल गया,
मैंने भी जमाने भुला दिए,
आँखों की गुस्ताखी ने,
ख़्वाबों के दीपक बुझा दिए,
कुछ लोगों ने छोटी सी,
बातों के फ़साने बना दिए,
कुछ लोगों ने राज़ गजब के,
दिल ही दिल में दबा दिए,
हमने उनका दर्द ले लिया,
रंज हमारे छुपा दिए,
जिनकी खातिर बेकस ने,
गिन कर बरसों बिता दिए,
आज उन्होंने बेकस की,
लाश पे चाकू चला दिए।
Sunday, August 24, 2008
घर आंगन में यूँ मज़हब की दीवार उठाना ठीक नहीं,
ऐ खुदा मुझे बतला दे के मैं तुझको कहाँ तलाश करुँ,
इसकी मस्जिद साफ़ नहीं उसका बुतखाना ठीक नहीं।
यहाँ मौत के फतवे रहते हैं वहाँ धर्म के चाकू चलते हैं,
घर में ही छुप कर रहना बाहर का ज़माना ठीक नहीं।
जाकर फूंको उन महलों को हैवान जहाँ पर रहते हैं,
ये घर मुफलिस इंसानों का इसको तो जलाना ठीक नहीं।
वो मौत के सौदागर हैं सब ये खौफ के सब व्यापारी हैं,
पंडितजी भी पाक नहीं और खान-ऐ-खाना ठीक नहीं।
तुझको भी हो जो नाज़ तो सुन ले सच साकी इस महफिल का,
नफरत की मदिरा बिकती है तेरा मयखाना ठीक नहीं।
उनको भी इल्म है ज़रा ज़रा, लेकिन वो भी समझाते हैं,
ये बातें सच्ची हैं बेकस पर जुबां पे लाना ठीक नहीं।
Friday, August 8, 2008
इस शहर में कलियों से लहू टपकता देखकर,
डर गया मैं अमन को घुट घुट के मरता देखकर,
और जिंदा लाशों के ख़्वाबों को जलता देख कर,
जाता हूँ मालिक अब तुम्हारी रहनुमाई देख ली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
स्याह रातों में गमजदा नाचती वो औरतें,
कौडियों के मोल बिकती हुई सैकड़ों गैरतें,
और हैवानों के हाथों बिखरती सी जीनतें,
वो गलियां जहाँ दिए घुँघरू सुनाई, देखली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
भूख से गिरते हुए और प्यास से मरते हुए,
कंकाल से वो जिस्म दम आखिरी भरते हुए,
डरते हुए जान से और मौत को तरसते हुए,
उन जिस्मों से होती हुई जां की विदाई देखली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
उन लक्ष्मीपुत्रों के घर रहती हैं सदा दीवालियाँ,
और साकी के लिए हैं मोतियों की थालियाँ,
पर हम गरीबों के लिए हर रोज़ मिलती गालियाँ,
उन श्वेत चेहरों पर पुती काली सियाही देख ली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
उजले लिबासों वाले वो सेठ और वो शाहजी,
कोठों में छुप गए जब रात कि नौबत बजी,
और फिर नाचीं हैं कुछ लाशें गहनों में सजी,
उन पर्दानशीं चेहरों कि मैंने बेहयाई देखली।
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
इन महल वालों पे मैं पत्थर उठा सकता नही,
तेरी तरह खून की नदियाँ बहा सकता नही,
और मजहब के लिए खंज़र चला सकता नही,
बात ज़ब दम की चली अपनी कलाई देख ली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
सुन नही सकता हूँ में पंडित की झूठी आरती,
और वो अजाने मुल्ला तुझको ही है पुकारती,
या के ईशा के जनों की प्रार्थना दिल हारती,
मैंने अब तक तुझको सुन, दे दे दुहाई देखली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
दिखता है जिसमे अक्स-ऐ-रब मैं वो शीशा तोड़ दूँ,
या के दीवारों से सर टकरा के अपना फोड़ दूँ,
दिल चाहता है आज मैं ख़ुद को तड़पता छोड़ दूँ,
उम्र भर कर के मुकद्दर से लडाई देख ली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
आ गई गर हाथ में तलवार तो फिर देखना,
कट के गिरेगा किस तरह तू मेरा सिर देखना,
और बुलंद होता हुआ जिस्म-ऐ-फातिर देखना,
मैंने तो मेरी जान से सहकर जुदाई देखली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
मैं चाहता हूँ आज जहन्नुम और जन्नत फूँक दू,
इक बार मेरा दिल अगर दे दे इजाज़त फूँक दूँ,
मुझ पर तेरी जितनी है सारी इनायत फूँक दूँ,
आग इस दुनिया में है किसने लगाई देखली,
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली.
मेरा ख्वाब था कि मैं कभी दिन के उजाले देखता,
सूरज की किरणों कि चादर सर पे डाले देखता,
बैठता मैं छाँव में फिर पांवों के छाले देखता,
बेकस ने तो सिर्फ अपनी शिकस्तापाई देखली
जा खुदाया आज तेरी भी खुदाई देख ली।
Sunday, August 3, 2008
मिलूँगा पर उजालों से घबराता मिलूँगा।
दीवार-ओ-दर मुझे नसीब न हुए और,
मैं तस्वीर बनके दीवार सजाता मिलूँगा।
जलने से मुझे मिलता है सुकून बेहिसाब,
इक रोज़ ख़ुद के घर को जलाता मिलूँगा।
जलता था मैं तो बरसा नही इक बूँद भी बादल,
मैं लेकिन घटाओं को अश्क पिलाता मिलूँगा।
जिसदिन तुझ को छोड़ देगा ज़माना बेपनाह,
मैं तुझको ऐ दोस्त तब भी बुलाता मिलूँगा।
BEKAS की मुहब्बत को समझेगा जब जहाँ,
मैं तब भी मेरे दिल पे तरस खाता मिलूँगा.
